
इय झायंतो खवओ जइया परिहीणवायिओ होइ ।
आराधणाए तइया इमाणि लिंगणि दंसेई॥1910॥
ध्यान मग्न जब क्षपक बोलने में हो जाता है असमर्थ ।
रत्नत्रय में हूँ सलग्न मैं तन-चेष्टा से करे प्रकट॥1910॥
अन्वयार्थ : जैसे ध्यान करने वाले क्षपकमुनि जिस समय में वचनरहित हो जाते हैं, रोगादि के वश से जिह्वा थक जाये तो उस अवसर में अपने अंत:करण में चार आराधनाओं में सावधानी के इतने चिह्न वैयावृत्त्य करने वालों को दिखायें, जिन चिह्नों से अपना अंतरंग का अभिप्रायपरिणाम ऊपर/बाहर से टहल करने वालों को प्रगट हो जाये या दिख जाये ।
सदासुखदासजी