
हुं कारंजलिभमुहंगुलीहिं अच्छहिं वीरमुठ्ठीहिं ।
सिरचालणेण य तहा सण्णं दावेदि सो खवओ॥1911॥
हुंकार भरे, भाैं संचालन से अथवा कर-अंजुलि द्वारा ।
मुट्ठी बाँधे शीश हिलाये संकेत करे नेत्रों द्वारा॥1911॥
अन्वयार्थ : हुंकार करके, हाथ जोडने से, भाैंहें उठाकर , मस्तक हिलाकर, हाथ की पाँच अंगुलियाँ दिखाकर, उपदेशदाता आचार्य को अपनी प्रसन्न दृष्टि दिखाकर, वीरों के समान मुष्टि बाँधकर, मस्तक को चलाकर इत्यादि अनेक संज्ञा, समस्या या संकेत द्वारा अपनी आराधना में दयृढ अभिप्राय को दिखाते हैं । अपना धैर्य दिखाते हैं, धर्म में सावधानी दिखाते हैं, वेदना पर विजय को, निर्भयता को, स्वरूप की सावधानी को तथा संयम में दृढता, उपदेश की ग्रहणता को दिखाते हैं । जिह्वा थक जाये, बोलने की सामर्थ्य घट जाये तो भी धर्म में अपनी लीनता को संकेत द्वारा प्रगट दिखाते हैं ।
सदासुखदासजी