
तो पडिचरया खवयस्स दिंति आराधणाए उवओगं ।
जाणंति सुदरहस्सा कदसण्णा कायखवएण॥1912॥
क्षपक मुनि के संकेतों को समझें निर्यापक आचार्य ।
क्षपक लीन है आराधन में आगमज्ञ मुनि लेते जान॥1912॥
अन्वयार्थ : क्षपक संज्ञा से अपना संकेत का ज्ञान जिनको कराया, ऐसे वैयावृत्त्य करने वाले मुनि, वे क्षपक का उपयोग आराधना में तत्पर है, ऐसा जानकर अपने परिश्रम की सफलता है - ऐसा समझ लेते हैं । यह क्षपक धर्म में सावधान है, परिणामों में कायरता नहीं है, उज्ज्वलता है, ऐसे संकेत से समस्या को जान लेते हैं । इस प्रकार ध्यान के फल की महिमा को सोलह गाथाओं में वर्णन किया । इति नाम के ग्रन्थ में सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में ध्यान नामक सैंतीसवाँ अधिकार दो सौ सात गाथाओं में पूर्ण किया ।
सदासुखदासजी