+ अब अठारह गाथाओं में लेश्या नाम का अडतीसवें अधिकार का वर्णन करते हैं - -
इय समभावमुवगदो तह ज्झायंतो पसत्तझाणं च ।
लेस्साहिं विसुज्झंतो गुणसेढिं सो समारुहदि॥1913॥
इसप्रकार समभाव प्राप्त कर क्षपक धारता उत्तम ध्यान ।
लेश्याओं को कर विशुद्ध गुण-श्रेणी करता आरोहण॥1913॥
अन्वयार्थ : ऐसे समभाव को प्राप्त हुए और प्रशस्त ध्यान को ध्याने वाले मुनि, वे लेश्या की उज्ज्वलता को प्राप्त होते हैं, वे गुणों की श्रेणी पर चढते/शुद्धता की वृद्धि को प्राप्त होते हैं ।

  सदासुखदासजी