
जह बाहिर लेस्साओ किण्हादीओ हवंति पुरिसस्स ।
अब्भंतर लेस्साओ तह किण्हादी य पुरिसस्स॥1914॥
जैसे मानव का शरीर काले गोरे रंग का होता ।
त्यों अन्तर परिणति में प्राणी का कृष्णादिक रंग होता॥1914॥
अन्वयार्थ : जैसे पुरुष की बाह्य/द्रव्य लेश्या कृष्णादि होती हैं, तैसे ही कृष्णादि लेश्यायें पुरुष के अभ्यंतर में भाव लेश्या भी होती हैं । बाह्य लेश्या तो शरीर के रंग हैं, वे आत्मा का उपकारकअपकारक नहीं हैं और कषायों से मन-वचन-काय की परिणति का रंग शुभ-अशुभभाव, वह अभ्यंतर लेश्या है ।
सदासुखदासजी