तेओ पम्मा सुक्का लेस्साओ तिण्णि विदुपसत्थाओ ।
पडिवज्जेइय कमसो संवेगमणुत्तरं पत्तो॥1916॥
पीत पद्म अरु शुक्ल लेश्या तीन प्रशस्त कहें जिनराज ।
क्रम से कर स्वीकार इन्हें संवेग भाव करता धारण॥1916॥
अन्वयार्थ : तेजोलेश्या, पद्मलेश्या, शुक्ललेश्या - ये तीन लेश्यायें प्रशस्त हैं - सराहने योग्य हैं । जो उत्कृष्ट धर्मानुराग को प्राप्त होता है, वह तीन लेश्याओं को क्रमश: प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी