
मंदा हुंति कसाया बाहिरसंगविजडस्स सव्वस्स ।
गिण्हइ कसाय बहुलो चेव हु सव्वंपि गंथकलिं॥1919॥
बाह्य परिग्रह के परित्यागी को होती है मन्द कषाय ।
परिग्रह पाप वही रखता है जिसकी होती तीव्र कषाय॥1919॥
अन्वयार्थ : समस्त बाह्य परिग्रह रहित के कषाय मंद होती है; क्योंकि तीव्रकषाय के धारक ही समस्त परिग्रहरूप कालिमा को ग्रहण करते हैं । इसलिए बाह्य परिग्रह के अभाव से ही कषायों की मंदता होती है ।
सदासुखदासजी