जह इंधणेहिं अग्गी वढ्ढइ विज्झाइ इंधणेहिं विणा ।
गंथेहिं तह कसाओ वढ्ढइ विज्झाइं तेहिं विणा॥1920॥
ईंधन से अग्नि बढ़ती है ईंधन नहिं तो बुझ जाती ।
परिग्रह से कषाय बढ़ती है परिग्रह नहिं तो घट जाती॥1920॥
अन्वयार्थ : जैसे अग्नि ईंधन से बढती है, ईंधन बिना बुझ जाती है, तैसे कषायें परिग्रह से बढती हैं, परिग्रह बिना शांत हो जाती हैं ।

  सदासुखदासजी