जह पत्थरो पडंतो खोभेइ दहे पसण्णमवि पंकं ।
खोभेइ पसंतंपि कसायं जीवस्स तह गंथो॥1921॥
जल में पत्थर फेकें तो कीचड़ ऊपर है आ जाती ।
भीतर दबी कषाय जीव की परिग्रह से ऊपर आती॥1921॥
अन्वयार्थ : जैसे जल के द्रह में गिरता हुआ पत्थर, वह शांत कर्दम को भी क्षोभरूप कर देता है, तैसे ही जीव के दबी हुई कषाय को, परिग्रह है; वह उदीरणा/शीघ्र उदय को प्राप्त होता है ।

  सदासुखदासजी