
अब्भंतरसोधीए गंथे णियमेण बाहिरे चयदि ।
अब्भंतरमइलो चेव बाहिरे गेण्हदि हु गंथे॥1922॥
अन्तर शुद्धि से परिग्रह का त्याग नियम से हो जाता ।
अन्तर में यदि होय मलिनता, ग्रहण परिग्रह का होता॥1922॥
अन्वयार्थ : अभ्यंतर परिणामों की शुद्धता हो तो नियम से बाह्य परिग्रह का त्याग होता है । जिसके अभ्यंतर परिणाम उज्ज्वल हो गये, उसके बाह्य परिग्रह का त्याग होता ही है और जिसके अभ्यंतर परिणाम मलिन हैं, वह बाह्य परिग्रह को ग्रहण करता ही है । जिसके अभ्यंतर में राग है, वह परिग्रह ग्रहण करेगा ही । जिसके अभ्यंतर राग नष्ट हो गया है, वह बाह्य परिग्रह में ममत्व नहीं करता है ।
सदासुखदासजी