
जह तण्डुलस्स कोण्डयसोधी सतुसस्स तीरदि ण कादुं ।
तह जीवस्स ण सक्का लिस्सासोधी ससंगस्स॥1924॥
ऊपर यदि छिलके होवंे तो चावल शुद्ध न हो सकते ।
परिग्रहवन्त जीव के भी परिणाम विशुद्ध न हो सकते॥1924॥
अन्वयार्थ : जैसे तुषसहित तंदुल की अभ्यंतर लाली दूर किये बिना तंदुल को उज्ज्वल करने के लिये समर्थ नहीं होता, तैसे परिग्रह सहित जीव के लेश्या की शुद्धता करने में समर्थ नहीं होता ।
सदासुखदासजी