खाइयदंसणचरणं खओवसमियं च णाणमिदि मग्गो ।
तं होइ खीणमोहो आराहित्ता य जो हु अरहंतो॥1926॥
क्षायिक दर्शन चरित ज्ञान क्षयोपशम का आराधन कर ।
क्षीण मोह हो क्षपक तुरत अन्तर्मुहूर्त में हो अर्हन्त॥1926॥
अन्वयार्थ : उत्कृष्ट आराधना के धारक के क्षायिक सम्यग्दर्शन, क्षायिक चारित्र और क्षायोपशमिक ज्ञान - ये मोक्ष का मार्ग है । बारहवें गुणस्थान के धारक इनको आराध कर अरहंत होते हैं ।

  सदासुखदासजी