
एवं सुभाविदप्पा ज्झाणोवगओ पसत्थलेस्साओ ।
आराधणापडायं हरइ अविग्घेण सो खवओ॥1931॥
भलीभाँति निज आत्मभावना भाकर शुभ लेश्यायुत ध्यान ।
करे क्षपक निर्विघ्न, पताका-आराधन करता धारण॥1931॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार अच्छी तरह से आत्मा की भावना करके ध्यान को प्राप्त हुए हैं और प्रशस्त लेश्या के धारक जो क्षपक हैं, वे निर्विघ्नता पूर्वक आराधना पताका को पहरे हैं/ ग्रहण करते हैं ।
सदासुखदासजी