तेलोक्कसव्वसारं चउगइसंसार दुक्खणासयरं ।
आराहणं पवण्णो सो भयवं मुक्खपडिमुल्लं॥1932॥
तीन लोक में सारभूत अरु चहुँगति भवदुःख की नाशक ।
शिवसुख का है मूल्य अहो भगवन पाते यह आराधन॥1932॥
अन्वयार्थ : त्रैलोक्य का सम्पूर्ण सार और चतुर्गति संसार के दु:ख के नाश करने वाली तथा मोक्ष का मूल्य ऐसी जो आराधना, उसे जो प्राप्त होता है, वह भगवान है ।

  सदासुखदासजी