एवं जधक्खादविधिं संपत्ता सुद्धदंसणचरित्ता ।
केई खवंति खवया मोहावरणतरायाणि॥1933॥
यथाख्यात चारित्र विधि से पाकर पूर्ण दर्श चारित्र ।
मोह-आवरण अन्तराय क्षय कर देते हैं कोई क्षपक॥1933॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार यथाख्यात चारित्र की विधि को प्राप्त हुए हैं और शुद्ध है सम्यग्दर्शन, सम्यक्चारित्र जिनके ऐसे कोई क्षपक मोहनीय और ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय कर्म का नाश करता है ।

  सदासुखदासजी