केवलकप्पं लोगं संपुण्णं दव्वपज्जयविधिहिं ।
ज्झायंता एयमणा जहंति आराहया देहं॥1934॥
सकल द्रव्य पर्याय भेदयुत ज्ञेयभूत यह लोक समस्त ।
हो एकाग्र जानते केवलि आराधक छोड़ें निज देह॥1934॥
अन्वयार्थ : और केवलज्ञान में ज्ञेय होने योग्य ऐसे सम्पूर्ण लोक के द्रव्य-पर्याय के भेदों को अपने में एकाग्र रहकर जानते हैं, ऐसे आराधक अरहंत भगवान देह को त्यागते हैं ।

  सदासुखदासजी