
सव्वुक्कस्सं जोगं जुंजंता दंसणो चरित्ते य ।
कम्मरयविप्पमुक्का हवंति आराधया सिद्धा॥1935॥
सर्वाेत्तम दर्शन चारित्र प्राप्त करके वे आराधक ।
चार अघाति कर्म रजों का कर विनाश वे होते सिद्ध॥1935॥
अन्वयार्थ : आराधना के धारक सर्वोत्कृष्ट योग को दर्शन चारित्र में युक्त करके कर्मरूपी रज रहित होकर सिद्ध होते हैं ।
सदासुखदासजी