अह सावसेसकम्मा मलियकसाया पणट्ठमिच्छत्ता ।
हासरइ जरइभयसोगदुगुंछावेयणिम्महणा॥1937॥
कर्म शेष रहते हैं जिनके करते हैं मिथ्यात्व विनष्ट ।
हास्य अरति रति शोक जुगुप्सा, भय त्रिवेद का करें मथन॥1937॥

  सदासुखदासजी