पं-सदासुखदासजी
सव्वसमाधाणेण य चरित्तजोगे अधिठ्ठिदा सम्मं ।
धम्मे वा उवजुत्ता ज्झाणे तह पढमसुक्के वा॥1939॥
समाधान से चरित योग में रहते हैं वे सम्यक् निष्ठ ।
धर्मध्यान या प्रथम शुक्ल में लीन करंे अपना उपयोग॥1939॥
सदासुखदासजी