
तिंहु
अणुत्तरवासी देवा सुविसुद्धलेस्सा य॥1940॥
इसप्रकार मध्यम आराधन पालन करके तजते देह ।
शुभ लेश्याओं के धारक वे होते अनुतरवासी देव॥1940॥
अन्वयार्थ : अथवा जिनके कर्म क्षय नहीं हुए हैं, अवशेष रह गये हैं, कषायों का जिनने मथन किया है, नष्ट हुआ है मिथ्यात्व जिनका, हास्य, रति, अरति, शोक, भय जुगुप्सा और वेद - इनका मथन करके मन्द कर दिये हैं । पंच समितियों से सहित, तीन गुप्ति से सहित, संवर को धारण करके, समस्त संग-परिग्रह रहित, धीर-वीर परिणामों में दीनतारहित, सुख-दु:ख में समभावसहित और देह में या रागादि में मूढतारहित, सम्पूर्ण सावधानी पूर्वक चारित्र पालने में सम्यक्पने आरूढ हुए, धर्मध्यान में या प्रथम शुक्लध्यान में जो उपयुक्त हैं, वे पुरुष/साधु ऐसी मध्यम आराधना को पालकर, शरीर त्यागकर शुक्ल लेश्या के धारक अनुत्तर विमानों में बसने वाले अहमिंद्र देव होते हैं ।
सदासुखदासजी