पं-सदासुखदासजी
दंसणणाणचरित्ते उक्किट्ठा उत्तमोपधाणा य ।
इरियावहपडिवण्णा हवंति लवसत्तमा देवा॥1941॥
दर्शन-ज्ञान-चरित उत्कृष्ट तथा उत्तम तप को धरते ।
ईर्यापथ आस्रव के धारी अनुदिश में होते अहमिन्द्र॥1941॥
सदासुखदासजी