कप्पोवगा सुराजं अच्छरसहिया सुहं अणुहवंति ।
तत्तो अणंतगुणिदं सुहं दु लवसत्तमसुराणं॥1942॥
वैमानिक सुर जो सुख भोगें अपनी देवांगना के संग ।
उससे भी सुख-गुण अनन्तमय भोग भोगते हैं अहमिन्द्र॥1942॥
अन्वयार्थ : जो यहाँ दर्शन-ज्ञान-चारित्र में उत्कृष्ट हैं, उत्तम हैं, प्रधान हैं, ईर्यापथ को प्राप्त हुए हैं, वे "लवसत्तमदेवा:" अर्थात् अहमिंद्र देव होते हैं । अप्सराओं सहित कल्पवासी देव जो सुख अनुभवते हैं, उनसे अनन्तगुणा सुख अहमिंद्र देव अनुभवते हैं - भोगते हैं ।

  सदासुखदासजी