णाणम्मि दंसणम्मि य आउत्ता संजमे जहक्खादे ।
वढ्ढिटलवोवधाणा अवहियलेस्सा सददमेव॥1943॥
जो मुनि दर्शन ज्ञान और क्षायिक चारित में लीन रहें ।
सदा बढ़ायें अपने तप को हों विशुद्ध लेश्या वाले॥1943॥

  सदासुखदासजी