पजहिय सम्मं देहं सददं सव्वगुणावढ्ढिदगुणढ्ढा ।
देविंदचरमठाणं लहंति आराधया खवया॥1944॥
वे आराधक क्षपक भावना सम्यक् पूर्वक देह तजें ।
अणिमा आदिक ऋद्धि सहित उपरिम स्वगाब में देव बनें॥1944॥
अन्वयार्थ : ज्ञान में, दर्शन में, यथाख्यातचारित्र में जो अत्यन्त युक्त हैं, तप के परिकर को बढाते हैं, निरंतर लेश्या की उज्ज्वलता को प्राप्त हुए हैं और निरन्तर सर्वगुणों से वृद्धिंगत गुणों से सहित हैं - ऐसे आराधना के धारक क्षपक देह का सम्यक्/आराधनापूर्वक त्याग करके सोलहवें स्वर्ग में इन्द्र होते हैं ।

  सदासुखदासजी