
सुयभत्तीए विसुद्धा उग्गतवोणियमजोगसंसुद्धा ।
लोगंतिया सुरवरा हवंति आराधया धीरा॥1945॥
श्रुत भक्ति से हो विशुद्ध तप नियम और आतापन योग ।
शुद्ध धीर आराधक मुनिवर होते हैं लौकान्तिक देव॥1945॥
अन्वयार्थ : जो श्रुतज्ञान की भक्ति से अति उज्ज्वल हैं, उग्र तप के करने वाले हैं, नियम ध्यान से शुद्ध हैं, वे धीर-वीर आराधना के धारक मरण करके लौकांतिक देव होते हैं ।
सदासुखदासजी