जावदिया रिद्धीओ हवंति इंदियगदाणि य सुहाणि ।
ताइं लहंति ते आगमेसि भद्दा सया खवया॥1946॥
जितनी भी ऋद्धियाँ जगत में एवं जितने इन्द्रिय सुख ।
क्षपक भद्र परिणामी सबको भाविकाल में प्राप्त करें॥1946॥
अन्वयार्थ : जगत में जितनी ऋद्धियाँ हैं और जितने इन्द्रियजनित सुख हैं, उन समस्त ऋद्धियों को और सुखों को आगामी काल में भद्र-परिणामी क्षपक प्राप्त होंगे ।

  सदासुखदासजी