
जे वि हु जहण्णियं तेउलेस्समराहणं उवणमंति ।
ते वि हु सोधम्माइसु हवंति देवा ण हेठ्ठिल्ला॥1947॥
तेजो लेश्या युक्त क्षपक जो आराधना जघन करते ।
सौधर्मादिक में सुर हों इससे नीचे नहिं जन्म लहें॥1947॥
अन्वयार्थ : जो जघन्य तेजोलेश्या में आराधना को प्राप्त होते हैं, वे भी सौधर्मादि स्वर्ग में देव होते हैं । नीचे के भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी देवों में जन्म नहीं लेते । इन देवों में मिथ्यादृष्टि ही जन्म लेते हैं । सम्यग्दृष्टि भवनत्रिक में उत्पन्न नहीं होते ।
सदासुखदासजी