
किं जंपिएण बहुणा जो सारो केवलस्स लोगस्स ।
तं अचिरेण लहंते फासित्ताराहणं णिखिलं॥1948॥
तीन लोक में सारभूत है जो भी वह सब प्राप्त करें ।
जो आराधक जीव जगत में, और अधिक क्या बात कहें॥1948॥
अन्वयार्थ : अधिक कहने से क्या? सम्पूर्ण आराधना को अंगीकार करके इस लोक के समस्त सार को अल्प काल में प्राप्त होते हैं ।
सदासुखदासजी