पं-सदासुखदासजी
सदिमंतो धिदिमंतो सढ्ढासंवेगवीरियोवगया ।
जेदा परीसहाणं ऊवसग्गाणं च अभिभविय॥1950॥
श्रुत चिन्तक अरु धैर्य शील श्रद्धा संवेग वीर्ययुत हों ।
परिषह जय करते उपसगाब के आगे नहिं विचलित हो॥1950॥
सदासुखदासजी