सुक्कं लेस्समुवगदा सुक्कज्झाणेण खविदसंसारा ।
सम्मुक्ककम्मकवया सविंति सिद्धिं धुदकिलेसा॥1952॥
लेश्या शुक्ल लहें अरु ध्यान शुक्ल सेभवदुख करें विनाश ।
कर्म कवच से मुक्त हुए संक्लेश रहित सिद्धि हो प्राप्त॥1952॥
अन्वयार्थ : आराधना के धारक जीव देव-लोकों में सर्वोत्कृष्ट भोगों को भोगकर आयु के अन्त में देवलोक से चयकर, उत्तम मनुष्यभव में उत्पन्न होते हैं और मनुष्य संबंधी अतुल ॠद्धि को पाकर भी सभी को त्यागकर जिनेन्द्र उपदिष्ट धर्म का आचरण करते हैं । अपने स्वरूप का स्मरण/अनुभव करते हैं, धैर्य को धारण करते हैं । श्रद्धान, वैराग्य, वीर्य को प्राप्त होते हैं । परीषहों को जीतते हैं और उपसर्गों का तिरस्कार करते हैं/उपसर्ग को गिनते ही नहीं । ऐसे यथाख्यात चारित्र को प्राप्त होते हैं । और शुद्ध दर्शन को प्राप्त हो, ध्यान से युक्त हुए, संक्लिष्ट लेश्या को शुद्ध अर्थात् उज्ज्वल करते हैं । शुक्ललेश्या को प्राप्त हो शुक्लध्यान से संसार का नाश करते हैं । दूर उडाये हैं कर्मकृत क्लेश जिनने, ऐसे कर्मरूप कवच से छूटकर सिद्धि को प्राप्त होते हैं - निर्वाणगमन करते हैं ।

  सदासुखदासजी