एवं संथार गदो विसोधइत्ता वि दंसणचरित्तं ।
परिवडदि पुणो कोई झायंतो अट्टरुद्दाणि॥1953॥
संस्तर पर आरूढ़ और निर्मल दर्शन चारित पाकर ।
आर्त रौद्र दुर्ध्यान ग्रहणकर कोई क्षपक भी गिर जाते॥1953॥
अन्वयार्थ : कोई मुनि-क्षपक ऐसे संस्तर को प्राप्त होते हुए भी तथा दर्शन-ज्ञान-चारित्र को उज्ज्वल करके भी आर्त्त-रौद्रध्यान के वश हो जाते हैं, इस तरह वे आराधना से भ्रष्ट हो जाते हैं । भावार्थ - रत्नत्रय का धारक भी यदि आर्त्त-रौद्रध्यान को प्राप्त होता है तो वह आराधना से भ्रष्ट होकर रत्नत्रय का नाश करता है ।

  सदासुखदासजी