पं-सदासुखदासजी
गंथाणियत्ततण्हा बहुमोहा सवलेसवणासेवी ।
सद्दरसरूवगंधे फासेसु य मुच्छिदा घडिदा॥1961॥
परिग्रह तृष्णा हो अतृप्त बहुमोह गृहस्थों के आधीन ।
शब्दरूप रस गन्ध पर्श में मूच्छित होकर हों आधीन॥1961॥
सदासुखदासजी