सव्वेसु य मूलुत्तरगुणेसु तह ते सदा अइचरंता ।
ण लहंति खवोबसमं चरित्तमोहस्स कम्मस्स॥1963॥
मूलगुणों अरु उत्तरगुण में सदा लगाते हैं अतिचार ।
कभी न हो चारित्र-मोह का क्षयोपशम निर्मल परिणाम॥1963॥
अन्वयार्थ : जिसने वर्तमान में अच्छी तरह से भाया है आत्मा, संस्तर में आरूढ हुए हैं, ऐसा क्षपक भी मरण के समय में रोगादि की वेदना से पीडित हुआ संक्लेश करके पतन को प्राप्त होता है तो जो नित्य ही अवसन्न हैं, सदा ही पार्श्वस्थ हैं, सदाकाल कुशील हैं, संसक्त हैं, स्वच्छंद हैं, वे पतन को प्राप्त नहीं होंगे क्या ? अपितु पतन को प्राप्त होंगे ही । जैसे कर्दम में फँसा या मार्ग में थक गया, उसको अवसन्न कहते हैं, तैसे ही जो उपकरण में, वसतिका में, संस्तर के शोधने में, स्वाध्याय में, विहार करते समय भूमि को शोधने में, गोचरी की शुद्धता में ईर्यासमिति आदि में, स्वाध्याय के काल का अवलोकन करने में, स्वाध्याय का विसर्जन/समाप्ति इत्यादि में अनुद्यमी रहते हैं/प्रवर्तन करने में उद्यमी नहीं रहते, छह आवश्यकों में आलसी या आवश्यकों में हीनता करते हैं, या अधिकता करते हैं या वचन-काय से आवश्यक करते हैं, भावों से नहीं करते,चारित्र के पालने में खेद को प्राप्त होते हैं, वे अवसन्न जाति के भ्रष्ट मुनि हैं ।1 । जैसे कोई पुरुष शुद्ध मार्ग को देखते ही उस मार्ग के समीप वाले दूसरे मार्ग से गमन करता है; तैसे ही कोई निरतिचार संयम मार्ग जानता हुआ भी संयम में प्रवर्तन नहीं करता और संयम जैसा दिखे ऐसे मार्ग में प्रवर्तता है, वह पार्श्वस्थ है । भोजन देने वाले दातार की भोजन किये पहले ही स्तुति करे या भोजन किये बाद स्तवन करे तथा उत्पादन दोष, एषणा दोष से सहित दूषित भोजन करे, एक वसतिका में नित्य बसे, मुनीश्वरों की एक वसतिका में ममता भाव रखना वह चारित्र का नाश करता है तथा एक संस्तर में नित्य शयन करना, एक क्षेत्र में बसना, गृहस्थों के गृह के मध्य में बैठना, गृहस्थों के उपकरणों से प्रवृत्ति करना, दुष्टता पूर्वक भूमि का प्रतिलेखन करना/शोधना, मयूरपिच्छिका बिना दुष्टप्रतिलेखन से शोधना या और भी कारण बिना पादप्रक्षालनादि बारम्बार करना, वह पार्श्वस्थ नाम के भ्रष्ट मुनि का लक्षण है ।2 । जिसका लोक में प्रगट कुत्सित/खोटा स्वभाव होता है, वह कुशील है । कुशील के अनेक प्रकार हैं । कोई तो कौतुक कुशील हैं । जो औषध लेपन विद्या के प्रयोग से सौभाग्य के कारण राजद्वार में कौतुक दिखाते हैं, वे कौतुक कुशील हैं । कोई भूतिकर्म कुशील हैं । जो भूति/ धूलि या भस्म, सरसों फूल, फल या जलादि से मंत्र कर रक्षा करते हैं, वशीकरण करते हैं, वे भूतिकर्म कुशील हैं । अंगुष्ठप्रसेनिका, अक्षरप्रसेनी, शशिप्रसेनी, सूर्यप्रसेनी, स्वप्नप्रसेनी इत्यादि विद्याओं द्वारा लोकों को रंजायमान करते हैं, वे प्रसेनिका कुशील हैं । विद्या, मंत्र, औषध और लोकों में राग करने वाले प्रयोगों द्वारा या असंयमियों का इलाज करना, वह अप्रसेनिका कुशील हैं । जो अष्टांग निमित्त जानकर लोकों को आज्ञा करते हैं, वे निमित्त कुशील हैं । अपनी जाति या कुल की महिमा का प्रकाश करके जो भिक्षादि प्राप्त करते हैं, वे आजीव कुशील हैं । किसी के द्वारा उपद्रव को प्राप्त हुआ पर की शरण में प्रवेश करना/ जाना या अनाथशाला में प्रवेश करके आशा करना, वे भी आजीव कुशील हैं । विद्याप्रयोगादि करके पर के द्रव्य हरणादि का दंभ दिखाने में तत्पर या इन्द्रजालादि करके जो लोक को विस्मय रूप करते हैं, वे कुहन कुशील हैं । जो वृक्षों की या गुल्म अर्थात् छोटे वृक्षों की, पुष्पों की फलों की उत्पत्ति दिखाये या गर्भस्थापनादि करें, वे संमूर्च्छना कुशील हैं । जो कीटादि त्रसजाति के और वृक्षादि के फल-पुष्पादि का गर्भ नाश करे या शाप देवे, वे प्रपातन कुशील हैं । जो क्षेत्र, चतुष्पद, सुवर्ण इत्यादि परिग्रह ग्रहण करते हैं तथा हरित कंदफल का भोजन करें, उद्दिष्ट आहार करंे, अशुद्ध वसतिका ग्रहण करें, परस्त्रियों की कथाओं में जिन्हें राग हो, मैथुन सेवन में तत्पर हों, प्रमादी हों, विकाररूप जिनका भेष हो, वे सभी कुशील जाति के भ्रष्ट मुनि हैं । इनकी संगति से कुगति में पतन होता है ।3 । अब संसक्त के लक्षण कहते हैं - जो सुन्दर चारित्र में प्रीति नहीं करते, कुचारित्र में प्रीति के धारक होकर, नट के समान अनेक खोटे रूप - भेष का ग्रहण करने वाला हों, पंचेन्द्रियों के विषयों में आसक्त हों, तीन गौरव/गारव में आसक्त हों, स्त्रियों के विषयों में संकल्प धारण करते हों, गृहस्थजनों का संसर्ग जिसको प्रिय हो, वे संसक्त जाति के भ्रष्ट मुनि हैं ।4 । जो उन्मार्गचारी अकेला संघबाह्य प्रवर्तन करता हो, वह स्वच्छंद है । जिसके आहार, विहार, भेष, उपदेश, शयन, आसन, लोंच, त्याग, ग्रहण जिनसूत्र की आज्ञारहित यथेच्छ हों, वे स्वच्छंद हैं ।5 । ऐसे पंच जाति के भ्रष्ट तपस्वी कहे । इनको आराधना स्वप्न में भी नहीं होती है । और जिसने भावों में से शंकादि दोष दूर नहीं किये हों, जो कषायों के वशवर्ती हैं, अभिमानादि कषायों को त्यागने में समर्थ नहीं हैं, जिनको धर्म में अनुराग अति मंद है, जो सम्यग्दर्शनादि गुण और गुणों के धरनेवाले पुरुषों का अपमान करने वाले हैं, प्रचुर मायाचार को प्राप्त हुए हैं, निदान करने वाले हैं, जो इन्द्रियों के सुख के स्वाद में लंपटी हैं, मुझे क्या प्रयोजन है, ऐसे संघ के कार्य में अनादररूप प्रवर्तते हैं, सम्यग्दर्शनादि गुणों में सोते हैं - उत्साहरहित हैं, मिथ्यात्व, असंयम, कषायों में प्रचुर प्रवृत्ति कराने वाले वैद्यक शास्त्र, मायाचार के सिखाने वाले कौटिल्य शास्त्र, स्त्री-पुरुषों के लक्षण शास्त्र, धातु, वाद, काम, लोभ, विषय, मायाचार के बढाने वाले काव्य नाटकादि शास्त्र या चोरविद्या के शास्त्र या शस्त्रविद्या के, जीवों को मारने, पकडने, दाव, घाव, करने के शास्त्र तथा चित्रकला, गंधर्वकला, गंधादि करने के खोटे शास्त्र हैं, उन्हें पापसूत्र कहते हैं । इनमें जो अभ्यास - आदर करने वाले हैं, वे और वांछित विषयों की प्राप्ति के लिये जिनने आशा बाँधी है/आशा कर रखी है, तीन प्रकार के गारव से अपने को बडा मान रहे हैं, जो विकथादि पंचदश प्रमादों में आसक्त हैं, जो पंचसमिति की, तीन गुप्ति की, शील-संयम गुणों की भावनारहित हैं, जो परनिंदा में आसक्त हैं, जिनको भावों की शुद्धि में अनादर है, जिनकी परिग्रह में तृष्णा नहीं घटी है, जो मोह अज्ञान की अधिकता सहित हैं, जो सदोष वस्तु का सेवन करने में तत्पर हैं, जो शब्द, रस, रूप, गंध, स्पर्शरूप इन्द्रियों के विषयों में मूर्च्छित हैं, अति आसक्त हैं, जो पर लोक के हित में निर्वांछक हैं, जो इस लोकसंबंधी कार्य में जाग्रत हैं, स्वाध्यायादि धर्मकार्य में अनुद्यमी हैं - आलसी हैं, जो संक्लेशरूप बुद्धि के धारक हैं, जो समस्त मूलगुण-उत्तरगुणों में सदाकाल अतिचार दोष लगाते हैं, वे चारित्रमोह के क्षयोपशम को प्राप्त नहीं होते ।

  सदासुखदासजी