किंमज्झ णिरुच्छाहा हवंति जे सव्वसंघकज्जेसु ।
ते देवसमिदिवज्झा कप्पंते हुंति सुरमेच्छा॥1965॥
मुझको क्या? इस निरुत्साह से मुनिसंघ में नहिं आदरवान ।
देव-समिति से बाह्य, कल्प के अन्त निवासी हों चाण्डाल॥1965॥
अन्वयार्थ : जो समस्त संघ के कार्य में उत्साहरहित हैं, "जो, मुझे क्या? क्या मैं ही हूँ? मुझसे मेरा ही कार्य नहीं बनता! मैं किसका करूँ?" - इस प्रकार समस्त संघ के हित में, कार्य में, वैयावृत्त्य में अनादर सहित हैं, वे देवों की सभा में बाहर बसने वाले सुरम्लेच्छ होते हैं, देवों में म्लेछसमान हैं ।

  सदासुखदासजी