कंदप्पभावणाए देवा कंदप्पिया मदा होंति ।
खिब्भिसयभावणाए कालगदा होंति खिब्भिसया॥1966॥
कन्दर्प भावना से मरकर कन्दर्प जाति के होते देव ।
किल्विष भावों से मरकर हों किल्विष जाति के ही देव॥1966॥
अन्वयार्थ : जो असत्यवचन, निंद्यवचन आप बोले, दूसरों से बुलवाये और कामरति में लीन हो, वह कंदर्प भावना है । वे कंदर्प भावना के कारण कंदर्प देवों में उत्पन्न होते हैं । जो तीर्थंकरों की आज्ञा से प्रतिकूल हो, संघ का तथा चैत्य/प्रतिमा तथा जिनसूत्र की विनय रहित अविनयी हो, मायाचारी हो, वह किल्विष भावना है । जो किल्विष भावना पूर्वक मरण करते हैं, वे किल्विष जाति के देवों में उत्पन्न होते हैं ।

  सदासुखदासजी