अभिजोगभावणाए कालगदा आभिजोगिया हुंति ।
तह आसुरीए जुत्ता हवंति देवा असुरकाया॥1967॥
आभियोग्य भावों से मरनेवाले आभियोग्य हों देव ।
भाव-आसुरी से जो मरते होते असुर जाति के देव॥1967॥
अन्वयार्थ : जो साधु तंत्र-मंत्रादि बहुत भावों को 'अभियुंक्ते' नाम करता है तथा हास्यादि बहुत वाग्जालों को करता है, वह अभियोग भावना है । अभियोग भावना के कारण वाहन जाति के आभियोग्य देवों में उत्पन्न होते हैं और जो क्रोधी, मानी, मायावी हो तथा तप में, चारित्र में संक्लेशसहित हो एवं दृढ वैर में जिसकी रुचि हो, वे आसुरी भावना सहित हैं । वे जीव आसुरी भावना के कारण असुरदेवों में उत्पन्न होते हैं ।

  सदासुखदासजी