
सम्मोहणाए कालं करित्तु दो दुव्दुगा सुरा हुंति ।
अण्णंपि देव दुग्गइ उवयंति विराधया मरणे॥1968॥
सम्मोहन भावों से मरकर दुंदग1 सुर योनि पाते ।
अन्य विराधक मुनि भी मरकर हीन देव योनि पाते॥1968॥
अन्वयार्थ : उन्मार्ग का उपदेश देना और मार्ग जो रत्नत्रय उसका नाश करना, सत्यमार्ग को बिगाडकर अपने नवीन मार्ग का स्थापन करना, मिथ्यात्व उपदेश से जगत को मोह उत्पन्न कराना ऐसी सम्मोही भावना पूर्वक मरण करते हैं तो संमोहजाति के स्वच्छंद देवों में उत्पन्न होते हैं । मरण काल में दर्शन-ज्ञान-चारित्र के विराधक हैं, वे अन्य भी देव दुर्गति हीन देवपने को प्राप्त होते हैं ।
सदासुखदासजी