
इय जे विराधयित्ता मरणे असमाधिणा मरेज्जण्ह ।
तं तेसि बाल मरणं होइ फलं तस्स पुव्वुत्तं॥1969॥
रत्नत्रय को कर विनष्ट जो बिना समाधि मरण करें ।
यह उनका है बाल-मरण जिसका फल कह आए पहले॥1969॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार जो मरण काल में रत्नत्रय की विराधना करके असमाधि जो धर्म असावधानतापूर्वक मरण करते हैं, उनके बालमरण होता है और बालमरण का फल पूर्व में ग्रन्थ की आदि में वर्णन कर आये हैं, वही संसार-भ्रमण कराने वाला जानना ।
सदासुखदासजी