जे सम्मत्तं खवया विराधयित्ता पुणो मरेज्जण्ह ।
ते भवणवासि जोदिसभोमेज्जा वा सुरा होंति॥1970॥
सम्यग्दर्शन कर विनष्ट जो क्षपक मृत्यु को प्राप्त करें ।
व्यन्तर ज्योतिष अथवा भवन-वासियों में वे जन्म लहें॥1970॥
अन्वयार्थ : जो क्षपक सम्यक्त्व की विराधना करके मरण करते हैं, वे भवनवासी या ज्योतिष्कदेव या व्यंतरदेव होते हैं ।

  सदासुखदासजी