
दंसण णाणविहूणा तदो चुदा दुक्खवेदणुम्मीए ।
संसारमण्डलगदा भमंति भवसागरे मूढा॥1971॥
सम्यग्दर्शन-ज्ञान रहित वे मूढ़ स्वर्ग से च्युत होवें ।
भव-सागर में डूबें जिसमें दुःख-वेदन लहरें उछलें॥1971॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान से हीन - ऐसे मूढ मिथ्यादृष्टि भवन-व्यंतर-ज्योतिषी देवों से चयकर संसार-मंडल को प्राप्त हुए संसार रूप समुद्र में भ्रमण करते हैं । कैसा है संसार समुद्र ? दु:खवेदना ही हैं लहरियाँ जिसमें ।
सदासुखदासजी