
जो मिच्छत्तं गंतूण किण्हलेस्सादिपरिणदो मरदि ।
तल्लेस्सो सो जायइ जल्लेस्सो कुणदि सो कालं॥1972॥
मिथ्यादृष्टि होकर जो कृष्णादिक लेश्या सहित मरें ।
जिस लेश्या से मरें उसी लेश्यावाले होकर जन्में॥1972॥
अन्वयार्थ : जो मिथ्यात्व को प्राप्त होकर कृष्णादि लेश्यारूप परिणाम को प्राप्त होकर मरण करता है, वह जिस लेश्या को धारण करके मरता है, उसी लेश्या का धारक होता है । इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में आराधना का फल का वर्णन इकतालीस गाथाओं में वर्णन करके उन्तालीसवाँ अधिकार पूर्ण किया । आराधना मरण करके परलोक जाने का वर्णन तो लेश्या के अनुसार कहा ।
सदासुखदासजी