
समणाणं ठिदिकप्पो वासावासे तहेव उडुबंधे ।
पडिलिहिदव्वा णियमा णिसीहिया सव्वसाधूहिं॥1974॥
वर्षावास तथा ऋतु के आरम्भ काल में श्रमणों का ।
निषीधिका1 प्रतिलेखन करें नियम से स्थिति कल्प कहा॥1974॥
अन्वयार्थ : सर्व ही साधुओं को वर्ष-वर्ष में या ऋतु के आरम्भ में निषीधिका नियम से प्रतिलेखन करने योग्य है, ऐसा मुनीश्वरों का स्थितिकल्प है । इसका विशेष तो आगम से जाने बिना लिखने में आता नहीं । जो आचारांग में स्थितिकल्प कहा है, वही प्रमाण है; परन्तु सामान्य इसमें ऐसा है - मुनि के शरीर शव को स्थापन करने योग्य स्थान को निषीधिका कहते हैं ।
सदासुखदासजी