पं-सदासुखदासजी
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अब निषीधिका कैसी होती है, उसे कहते हैं -
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एगंता सालोगा णादिविकिठ्ठा ण चावि आसण्णा ।
वित्थिण्णा विद्धत्ता णिसीहिया दूरमागाढा॥1975॥
हो एकान्त जगह में जहाँ न अन्य मनुज गण देख सकें ।
नहीं दूर या पास नगर के विस्तृत प्रासुक अति दृढ़ हो॥1975॥
सदासुखदासजी