
अभिसुआ असुसिरा अघसाउज्जोवा बहुसमा य असिणिद्धा ।
णिज्जंतुगा अहरिदा अविला य तहा अणाबाधा॥1976॥
चींटी एवं छिद्र रहित हो सूखी हो समभूमि हो ।
हो प्रकाशयुत जन्तुरहित हो जहाँ न कोई बाधा हो॥1976॥
अन्वयार्थ : पर के द्वारा अदृश्य2 ऐसे एकांत में हो, प्रकाश सहित हो, नगर-ग्रामादि से अति दूर न हो और न अति निकट हो, विस्तीर्ण हो, विध्वस्त अर्थात् मर्दली हुई हो, अतिशयकारी अत्यंत दृढ हो - ऐसी निषिधका हो/अति पवित्र हो, बिलरहित हो, घास रहित हो, अनेक प्रकार से सम हो, ऊँची-नीची न हो, चिकनाई रहित हो, निर्जंतु हो, रज रहित हो, अविचल हो तथा बाधा रहित हो ।
सदासुखदासजी