सव्वसमाधी पढमाए दक्खिणाए दुभत्तगं सुलभं ।
अवराए सुहविहारो होदि य उवधिस्स लाभो य॥1978॥
प्रथम दिशा में संघ समाधि, दक्षिण में आहार सुलभ ।
पश्चिम में सुविहार संघ का उपकरणों की प्राप्ति सुलभ॥1978॥
अन्वयार्थ : निषीधिका के लाभ में कोई निमित्त की अपेक्षा विचार करे तो ऐसा जानना कि वसति की नैऋत्यकोण में पहले कही, वैसी वसतिका हो तो समस्त संघ में समाधि/ आराधना का लाभ होगा । दक्षिण दिशा में प्राप्त हो तो आगे संघ को आहार का लाभ सुलभ होगा, पश्चिम दिशा में प्राप्त हो तो जानना कि आगे संघ का विहार सुखरूप होगा तथा संघ को पीछी, शास्त्र, कमंडलादि का लाभ होगा ।

  सदासुखदासजी