
जदि तेसिं बाघादो दट्ठव्वा पुव्वदक्खिणा होइ ।
अवरुत्तरा य पुव्वा उदीचिपुव्वुत्तरा कमसो॥1979॥
यदि सम्भव नहिं उक्त दिशाओं में तो पूरब-दक्षिण में ।
पश्चिम-उत्तर या पूरब में उत्तर में पूर्वाेत्तर में॥1979॥
अन्वयार्थ : यदि पूर्वोक्त दिशा में निषीधिका न मिले तो पूर्व, दक्षिण अर्थात् अग्निकोण/ आग्नेयकोण और वायुकोण/वायव्यकोण में या पूर्व में, उत्तर में या ईशान में मिले तो उनका निमित्त ज्ञान से ऐसा फल जानना ।
सदासुखदासजी