
जदि वा एस ण कीरेज्ज विधि तो तत्थ देवदा कोई ।
आदाय तं कलेवर मुठ्ठिज्ज रमिज्ज बाधेज्ज॥1984॥
यदि एेसी विधि करें नहीं तो मनोविनोदी कोई देव ।
मृतक देह ले जावे अथवा रमण करे या विघ्न करे॥1984॥
अन्वयार्थ : यदि इस प्रकार जागरण तथा अंगुष्ठ के भाग में छेदन-बंधन नहीं किया जाये तो कदाचित् कोई धर्म का द्रोही या कौतूहली व्यंतरादि देव उस मृतक कलेवर में प्रवेश कर उठकर खडा हो जाये या अनेक क्रीडायें करने लगे या संघ को बाधा पहुँचाने लगे तो संघ के नवीन मुनि, कायर/भीरु मुनि, मंदज्ञानी मुनियों के परिणाम दर्शन-ज्ञान-चारित्र में शिथिल हो जायें तो बडा भारी अनर्थ प्रगट होगा । धर्म में उपद्रव होगा । इसलिए जागरण, छेदन, बंधन किया जाता है । इस लोक में व्यंतर सर्वत्र भरे हैं । ग्राम में, नगर में, वन में, पर्वत में, नदी में, गुफा में, महल में, मठ में, मकान में, वृक्ष, कूप, बावडी, मार्ग - सभी क्षेत्रों में निरंतर विचरते/घूमते रहते हैं । इसलिए जागरण, छेदन, बंधन करने से कोई धर्म से पराङ्मुख देवता उपद्रव नहीं कर सकते हैं ।
सदासुखदासजी