पुव्वाभोगिय मग्गेण आसु गच्छंत तं समादाय ।
अठ्ठिदमणियत्तंता य पिट्ठदो दे अणिब्भंता॥1988॥
शिविका लेकर पूर्व निरीक्षित पथ में तेजी से जायें ।
कहीं मार्ग में रुकें नहीं और न पीछे भी देखें॥1988॥

  सदासुखदासजी