पं-सदासुखदासजी
कुसमुट्ठिं घेत्तूण य पुरदो एगेण होइ गंतव्वं ।
अट्ठिदअणियत्तंतेण पिठ्ठदो लोयणं मुच्चा॥1989॥
कोई श्रावक मुट्ठी में कुश लेकर आगे गमन करे ।
वह भी कहीं न रुके और पीछे मुड़कर भी नहिं देखे॥1989॥
सदासुखदासजी