तेणकुसमट्ठिधाराए अव्वोच्छिण्णाए समणिपादाए ।
संथारो कादव्वो सव्वत्थ समो सगिं तत्थं॥1990॥
पहले जानेवाला श्रावक पूर्व निरीक्षित स्थल में ।
घास बिछाकर रचे बिछौना जो सर्वत्र समान रहे॥1990॥
अन्वयार्थ : संस्तर को प्राप्त क्षपक के शरीर को, गृहस्थजनों द्वारा तैयार की गई पालकी, शिविका या विमान उसमें (संस्तर सहित) मृतक शरीर को स्थापन करके, उसमें से उछल न जाये, इसलिए रक्षा के लिये (मृतक विधिपूर्वक) दृढ बाँधना और ले जाते समय शव का मस्तक ग्राम की तरफ होना चाहिए, उस मृतक की शिविका को गृहस्थजन उठाकर और पूर्व में देखे हुए मार्ग में शीघ्रता पूर्वक गमन करना चाहिए, मार्ग में खडे नहीं रहें । पीछे की ओर चलें नहीं, पीछे की ओर अवलोकन छोडकर गमन करें, पीछे की तरफ देखें नहीं और पुरुष कुशमुष्टि/घास-तृण को मुट्ठी में लेकर शिविका के आगे गमन करें । मार्ग में खडा नहीं रहे, उल्टा चले नहीं, वह भी पीछे मुडकर देखना छोडकर गमन करे और आगे जाकर पहले देखी हुई जो निषीधिका, उसको घास की मुट्ठी से विच्छेद रहित समान करके, क्योंकि जहाँ मुनि की देह का स्थापन करना है, उस भूमि को सर्वत्र समान कर ले ।

  सदासुखदासजी